"अन्नु जल्दी से नहा लो और फिर पढ़ाई करो ", कहती हुयी सुधा अपने कमरे में आयी। घड़ी में नौ बज चुके थे और घर अभी तक पूरा अस्त-व्यस्त पड़ा था । बाई को भी आज ही छुट्टी लेनी थी, कहते हुये उसने अलमारी पर रखा सूटकेस नीचे उतारा।
होली का आग़ाज़ हो चुका है। सूरज ने भी अपना ज़ोर अभी से ही दिखाना शुरू कर दिया है और ऊनी कपड़े भी अब अलमारी में पड़े-पड़े अलसा रहे हैं। आज सुधा ने ठान लिया था की सारे ऊनी कपड़े वापिस अंदर रख कर ही रहेगी।
उसने डबलबेड से भी दो बड़े सूटकेस बाहर निकाले और फिर अलमारी से सारे ऊनी कपड़े बाहर निकाल कर रखे।
इतने में ही उसे ख़्याल आया की गैस पर दूध उबलने रखा था। वह सब छोड़ कर भागती हुयी गैस के पास पहुँची तो देखा की दूध उफन चुका था। ख़ुद पर ही क्रोधित होते हुये वह सब समेटने लगी। अंदर से अन्नु ने आवाज़ लगायी,"मम्मी, बहुत भूख लगी है प्लीज़ मैगी बना दो।
वैसे तो अन्नु अपने लिये मैगी ख़ुद ही बना लेती है पर कल उसका गणित का पेपर है और सुधा उसको काम में नहीं उलझाना चाहती। यही कारण है की इतना काम होते हुये भी वह अन्नु से मदद लेना नहीं चाहती थी।
सब काम ख़त्म कर, सुधा एक बार फिर आ खड़ी हुयी अपने ऊनी कपड़ों के पास। उसने हरा वाला बड़ा सूटकेस खोला, अच्छी तरह से उसकी सफ़ाई कर कुछ ऊनी कपड़े उसमें जमा दिये। एक-एक कर सारे ऊनी कपड़े वह लगभग रख चुकी थी। नैप्थलीन की गोलियाँ डाल कर वह सूटकेस बंद ही करने वाली थी कि उसकी नज़र अपने शादी के लहंगे पर पड़ी।
उस पर नज़र पड़ते ही सुधा ना जाने कहाँ अपने अतीत की उन पुरानी स्मृतियों में खो गयी जो पुरानी होते हुये भी शायद कभी पुरानी होतीं ही नहीं ।
सब कुछ जैसे अभी ही घटित हो रहा हो, उसकी नज़रों के सामने। जैसे वह अभी उस दुकान पर हो और दुकानदार एक के बाद एक लहंगे निकाल रहा हो। उसे याद आने लगा कैसे सब लहंगों के बीच उसकी नज़र इसी एक लहंगे पर टिक गयी थी। माँ ने कहा था," एक दो और देख ले"। पर वह तो मन पक्का कर चुकी थी की यही लहंगा पहनेगी। माँ ने फिर हिदायत दी," इतना भारी है, कैसे संभालेगी स्टेज पर इसे?" पर उसको तो बस अब यही लहंगा चाहिये था।
उसे याद आया की कैसे लहंगे की क़ीमत सुन भाभी का मुँह खुला की खुला रह गया था पर बाबू जी के डर से कुछ बोल ना पायीं थीं वो।
बाबू जी ने भी कैसे अपनी लाड़ली का मन रखते हुये पूरे पैंतीस हज़ार दुकानदार के हाथ पर रख दिये थे।
कितनी ख़ुश थी वह अपनी शादी पर यह लाल रंग का लहंगा पहने हुये। सब की नज़रें मानो हट ही ना पा रहीं थीं उस पर से। माँ ने भी कितनी अलायें -बलायें उतारीं थीं उसकी और अपनी भीगी आँखों में से काज़ल निकाल कर उसको काला टीका लगा दिया था।
वह स्मृतियों में खोयी हुयी थी और फ़ोन बज उठा। फ़ोन उठाते ही माँ बोल पड़ीं," आज ऊनी कपड़े रखते वक़्त तेरी स्कूल की यूनीफार्म मिली। बस तेरी याद आयी तो सोचा तुझसे बात कर लूँ। हर बार सोचतीं हूँ यह यूनीफार्म किसी को दे दूँगी पर जैसे ही इसे देखतीं हूँ तो तेरी इतनी यादें आँखों के सामने घूम जातीं हैं की इसको हटाने का दिल नहीं करता।
वह मुसकुरा उठी और सोचने लगी कितनी अजीब होतीं हैं औरतें , वर्तमान में जींती हैं पर हर स्मृति को संजोये रखतीं हैं किसी ना किसी संदूक में।
वैसे कभी समय नहीं होता स्मृतियों के पन्ने पलटने का, पर कभी जो कोई स्मृति चिह्न हाथ लग जाये तो समय का कोइ ध्यान नहीं रहता इन्हें। फिर तब तक स्मृतियों की गलियों से बाहार नहीं निकलतीं जब तक कोई इन्हें उसमें से बाहार ना निकाले।
सचमुच बहुत ही अजीब होतीं हैं ये औरतें।
क्यूँ इतनी अजीब होतीं हैं औरतें?
आपके पास भी सुधा की तरह बहुत सी स्मृतियाँ क़ैद होंगी किसी ना किसी संदूक में। अपनी स्मृतियों के कुछ क़िस्से हमारे साथ भी ज़रूर साँझा कीजियेगा।